परमेश्वर की सवारीगाड़ी के लिए इंधन

“तेरे हाथ में क्या है?” निर्गमन 4ः2 में परमेश्वर ने मूसा से पूछा। 

मूसा को निश्चय नहीं था कि जो उसके हाथ में है, वह इतना पर्याप्त नहीं है कि परमेश्वर के काम आए। इसी तरह से, हम भी बहाने बनाने लगते हैं, जब देने के माध्यम से परमेश्वर की सेवा करने का अवसर सामने आता है। 

जब हम किसी को कुछ देते हैं, तो पाने की आशा रखे बिना, उसे वह वस्तु सौंप देते हैं। देना परमेश्वर की धार्मिकता को प्रगट करता है, जैसा कि 2 कुरिन्थियों 8ः11 में लिखा है। 

परमेश्वर द्वारा मूसा से किया गया प्रश्न आज भी हमारे कानों में गूंजता हैः जब देने का अवसर आता है, तो क्या हम भी बहाने बनाने लगते हैं? 

हम मोबाइल खरीद कर उसे नियमित रूप से रिचार्ज करते रहते हैं, तौभी क्या हम परमेश्वर से कहते हैं कि हमारे पास उसकी कलीसिया को देने के लिए कुछ भी नहीं है? हम अपनी मोटर सायकल/कार में नियमित रूप से इंधन डालते हैं; तो फिर यह कैसे हो सकता है कि हमारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। 

 

सवारी गाड़ी की कहानी 

एक सार्वजनिक सवारी गाड़ी में इंधन भरने के समान ही, देना भी एक ऐसा भेद है जो मानवता को छुटकारा देने की परमेश्वर की बड़ी योजना को आगे बढ़ने में बल प्रदान करता है। 

सवारी गाड़ी में तीन प्रमुख चरित्र होते हैंः ड्रायवर, कंडक्टर और यात्री।  

ड्रायवर बस को उस दिशा में चलाता है जिधर इसे जाना है।  

यात्रियों से कंडक्टर पैसे इकट्ठे करता है। इससे ड्रायवर को भरोसा हो जाता है कि सवारी गाड़ी वहाँ तक पहुँच जाएगी जहाँ प्रत्येक को पहुँचना है। 

इस दृश्य में सवारी गाड़ी एक कलीसिया के समान है, ड्रायवर परमेश्वर के समान है, कंडक्टर पास्टर, और यात्री सदस्यों के समान है।  

पासबान और सदस्यों दोनों को ही एक भूमिका पूरी करना है ताकि कलीसिया के लिए परमेश्वर के दर्शन को पूरा किया जा सके। 

प्रभु ने पासवान को जो कार्य सौंपे हैं, उस में से एक यह है कि वह सदस्यों को यह सिखाएं कि परमेश्वर के दर्शन को पूरा करने के लिए आर्थिक सहयोग देना कलीसिया का एक अनिवार्य कर्तव्य है। 

यदि यह आर्थिक सहयोग प्राप्त नहीं होता तो कलीसिया का आगे बढ़ पाना होगा। सवारी गाड़ी का किराया न देना - कलीसिया को सहयोग न देना - ड्रायवर - परमेश्वर को - इंधन से वंचित करने के समान है - कि संसार के लिए वह अपने दर्शन - सुसमाचार - को पूरा कर सके। 

परमेश्वर ने चेले बनाने के अपने दर्शन को पूरा करने के लिए हमें बुलाया है; वह हमें देख रहा है कि हमारे पास जो कुछ है उसे हमें उसके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए दे दें। 

 

चेले बनाना 

देना चेला बनाने की परमेश्वर की आज्ञा का एक हिस्सा है। मसीही उदारता परमेश्वर के अनुग्रह का कार्य है; यह हमारे जीवनों में आशीषों के द्वार को खोल देता है (2 कुरिन्थियों 8ः1-7)। 

चेले बनाने की सेवा में परमेश्वर कलीसिया को अपना सहकर्मी बना कर उस पर निर्भर रहता है। परमेश्वर हमें बुलाहट देता है कि हम समर्पण करने, देने, और कुछ पाने की आशा रखे बिना सहयोग देेने के लिए तैयार रहें (फिलि. 3ः18)। 

बाइबल अनेक ऐसे लोगों के विषय में बताती है जिन्होंने अपनी हैसियत से बढ़ कर परमेश्वर के लिए दियाः 

  • 1 राजा 17ः7ः16 में, विधवा स्त्री ने अपनी एकमात्र रोटी एलिय्याह भविष्यद्वक्ता को दे दिया। 
  • मरकुस 12ः41-44 में, कंगाल विधवा के पास जो कुछ था, वह सब उसने दे दिया। 
  • 2 कुरिन्थियों 8ः1-3 में, मकिदुनिया की कलीसिया ने कष्ट में होने के बाद भी उदारता से दिया। 

देना कोई विकल्प नहीं है; सभी विश्वासियों को उदारता से देने की आदत बनाना चाहिए चाहे हम धनी हो या निर्धन। 

अनेक लोग यह कहते हैं कि वे निर्धन हैं - उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं हैं। 

क्या यह सहीं है? नहीं। 

मैं मैंगोचि (मुसलमान पृष्ठभूमि के नए विश्वासी) के अपने मित्रों विषय में आपको कुछ बताना चाहता हूँ। 

उन्हें यह सिखाया गया कि परमेश्वर चाहता है कि वे उसके कार्य के लिए सहयोग दें, इसलिए वे परमेश्वर को अपने बगीचे या खेत की पैदावार के रूप में उन्हें मिली आशीष में से देते हैं। 

क्या वे इसलिए देते हैं क्योंकि उनके पास बहुत है? नहीं। परन्तु वे टमाटर, केला, सीताफल, मूंगफली, और आम जैसी अपनी खेजों की उपज भेंट के रूप में चढ़ाते हैं।  

परमेश्वर ने हम में से किसी को भी खाली बर्तन नहीं सौंपा है। जब परमेश्वर ने हमें उसके दर्शन को पूरा करने के लिए बुलाया है, तो वह जानता है कि हमारे बर्तन में कुछ है। 

हमारे पास क्या है, जिसे परमेश्वर अपने कार्य के लिए देने के लिए कह रहा है? परमेश्वर आज जो कुछ हमें उसके लिए समर्पित करने के लिए कह रहा है, वह जानता है कि वह हमारे पास है, और हम उसके लिए ऐसा कर सकते हैं। 

 

—मडालिटसो कपुता के द्वारा जारी एमडब्ल्यूसी विज्ञप्ति। मडोलिटसो कुपुता मलावी में ब्रदरन इन ख्राइस्ट चर्च के एक पासवान है। उन्होंने अपनी कलीसिया के वार्षिक काँफ्रेंस के दौरान यह उपदेश दिया। 

 

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