यीशु मसीहःहमारी एकमात्र आशा

एक ह्रदय के कक्षों के समान, एमडब्लयूसी के चार कमीशन ऐनाबैपटिस्ट सम्बन्धित कलीसियाओं के वैश्विक समुदाय की सेवा चार क्षेत्रों में करते हैंः डीकन, फेथ एण्ड लाइफ, पीस, मिशन। इन कमीशनों द्वारा जनरल कॉउंसिल के विचार विमर्श के लिए विषय तैयार किए जाते हैं, सदस्य कलीसियाओं के लिए मार्गदर्शन और संसाधनों का प्रबन्ध किया जाता है, और सामान्य हितों और लक्ष्यों के मामलों में एमडब्लयूसी से सम्बन्धित नेटवर्कों (तंत्रों) या सहभागिताओं को एक साथ मिलकर कार्य करने के लिए बढ़ावा दिया जाता है। निम्नलिखित लेख में इन्हीं में से एक कमीशन के द्वारा अपनी सेवकाई के प्रकाश में एक संदेश प्रस्तुत किया गया है।


इस समय, सारे विश्व में कोविड-19 नामक एक अजीब बीमारी के कारण घबराहट फैली हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) कोविड-19 के अपने विश्लेषण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि इसे विश्वव्यापी महामारी (पेन्डेमिक) के वर्ग में रखा जाए। यह बीमारी हर जाति, हर भाषा, और हर सामाजिक-आर्थिक वर्ग के लोगों को संक्रमित कर रही है और उन्हें मारती जा रही है।

डब्ल्यूएचओ के डायरेक्टर जनरल, तेद्रोस एधोनोम घेब्रेयेसूस का कहना है कि कोविड-19 हम पर बहुत भारी पड़ रहा है, परन्तु इसके अतिरिक्त, डब्ल्यूएचओ इस बात को लेकर काफी चिन्तित है कि इस विश्वव्यापी महामारी का दूसरी स्वास्थ सेवाओं पर क्या असर होगा और इसके क्या मायने होंगे, विशेष कर बच्चों के लिए।

यूएन इकोनॉमिक कमीशन फॉर लैटिन अमरीका एण्ड कैरेबियन (इसीएलएसी) की कार्यपालन सचिव एलिशिया बारसिना के अनुसार, कोविड-19 विश्वव्यापी महामारी इतिहास में सबसे भयानक महामारियों में से एक सिद्ध होगी।

बारसिना स्पष्ट करते हुए बताती हैं कि इस महामारी ने एक आवश्यक सार्वजनिक सेवा (मानव स्वास्थ) को खतरे में डाल दिया है और पहले से ही कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका बहुत बुरा असर होने वाला है।

निराश और असहाय दशा

वैज्ञानिक रात और दिन काम कर रहे हैं कि मानवजाति के लिए उत्साहित करने वाला एक समाधान ढूंढ़ सकें, परन्तु इस बीमारी की जटिलता ने सारे प्रयासों को उलझा कर रख दिया है और अब तक इस क्षेत्र में अच्छी खबर नहीं मिल पाई है।

इस बीमारी ने हमें बाध्य कर दिया है कि सरकार के आदेश के अनुसार हम अपने अपने घरों में ही सीमित रहते हुए सामाजिक दूरी बनाए रखें।

अनेक देशों में, स्वास्थ्य केन्द्रों में क्षमता से अधिक संक्रमितों के आने के कारण व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता संक्रमित होते जा रहे हैं और अनेक लोगों की मृत्यु होती जा रही है; अनेक मामलों में इसका कारण सुरक्षात्मक सुविधाओं का न होना है।

कुछ देशों में, मृतकों को दफन करने के लिए कब्रिस्तान में जगह कम पड़ती जा रही है इसलिए इन्हें एक साथ दफनाया जा रहा है या अपने घर के पीछे वाले आँगन में ही दफन किया जा रहा है, जबकि कुछ को तो सड़क किनारे ही छोड़ दिया जा रहा है।

सारांश में, इस लेख के अनुवाद किए जाने तक ढाई करोड़ से भी अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और 1 करोड़ अस्सी लाख के लगभग ठीक हो चुके हैं। किन्तु, इस त्रासदी का सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि साढ़े आठ लाख से भी अधिक लोग अब हमारे बीच में नहीं रहे। मानवजाति पर दुख, निराशा, और असहाय दशा हावी हो चुकी है।

अनेक कलीसियाएं जो मानवजाति को ढाढ़स बंधाने के लिए यीशु मसीह के सुसमाचार और इस संकट के मध्य सेवा का कार्य कर रही हैं, उन्हें सोशल डेस्टेंसिंग के मानदण्डों का पालन करते हुए अपने अपने दरवाजों को बन्द रखना पड़ रहा है। इस वास्तविकता ने कुछ लोगों के विश्वास पर भी बड़ा प्रहार किया है, और खास कर तब, जब वे अपने परिवार या मित्रों को मरते हुए देखते हैं; जबकि पासवान और सेवक भी कुछ कर पाने में असहाय हैं, यहाँ तक कि वे मृतकों को दफन भी नहीं कर पा रहे हैं।

एक उत्तर

ऐसा प्रतीत होता है कि संसार के पास अब कोई आशा नहीं रही। परन्तु आज मानव के लिए एक उत्तर बाइबल में पाया जाता हैः

“मैं अपनी आँखें पर्वतों की ओर लगाऊँगा। मुझे सहायता कहाँ से मिलेगी? मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है।” (भजन 121ः1-2)।

भजन संहिता 121 के आरम्भ में दी गई यह पुकार शायद दाऊद के ही मुँह से निकली थी। यह भजन हमें व्याकुलता के क्षणों में आशा प्रदान करता है जब ऐसा लगता हो कि सब कुछ बुरा हो रहा है, बाहर निकलने के सारे रास्ते बन्द हो चुके हैं और एक बड़े संकट के मध्य सहायता के लिए कोई हाथ बढ़ता हुआ दिखाई न दे रहा है।

यह एक ऐसा भजन है जो विश्वास के साथ इस आशा को बनाए रखने को प्रेरित करता है, कि परमेश्वर अपनी ईश्वरीय बुद्धि से सहायता प्रदान करेगा जिसकी अत्यंत आवश्यकता है - और अपने ठहराए हुए समय पर कार्य करेगा। यह हमें स्मरण दिलाता है कि जब मनुष्य अपने अनुसार कार्य करते हुए कोई ऐसा समाधान निकाल नहीं पाता जिससे कि एक विपरीत परिस्थिति में इच्छानुसार परिणाम प्राप्त हो सके, तब जीवित सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह समझने में हमारी सहायता कर सकता है कि वास्तव में क्या हुआ है, और ऐसा वह अक्सर हमें दुखों से छूट दिए बिना करता है।

वास्तविकता को समझने से आशा प्राप्त होती है और हमारे विश्वास को बल मिलता है ताकि हम दूसरों की सहायता कर सकें।

एकमात्र परमेश्वर

वास्तविकता में सिर्फ परमेश्वर ही पूरे अधिकार के साथ हस्तक्षेप कर सकता है और वैज्ञानिकोंको समझ प्रदान कर सकता है कि वे मानवजाति को शीघ्रातिशीघ्र इस बीमारी का इलाज उपलब्ध करा सकें। या, परमेश्वर उनका उपयोग इस रीति से भी कर सकता है, कि वे आश्चर्यजनक रूप से सरल तरीकों से ही इस प्राणघातक वायरस से मानवजाति को बचा लें।

भजन संहिता 91 में काव्य रूप में एक प्राणघातक मरी की जकड़न से मुक्त किए जाने की आशा का प्रचार किया गया है, परमेश्वर को एक ऐसे पिता या माता के रूप में चित्रित किया गया है जो अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए प्रेम से कपड़े पहनाते हैं ताकि उन्हें ठण्ड से और खतरों से बचा सके। निश्चय ही भजन का रचने वाला जिन बातों को यहाँ व्यक्त कर रहा है, वे मानव इतिहास के किसी समय पर कोरोना वायरस जैसी ही, या इससे भी भयानक मरी का समुदाय के द्वारा अनुभव किए जाने पर आधारित है।

“वह तुझे बहेलिए के जाल से, और महामारी से बचाएगा; वह तुझे अपने पंखों की आड़ में ले लेगा, और तू उसके परों के नीचे शरण पाएगा, उसकी सच्चाई तेरे लिए ढाल और झिलम ठहरेगी।” (भजन 91ः3-4)।

यीशु बाहर निकल कर मानवजाति से मुलाकात करने आता है 

वर्तमान में मानवजाति जिस प्रकार के समय में जी रही है ऐसे समय में यीशु मसीह ही हमारी एकमात्र आशा होना चाहिए। ठीक ऐसी ही परिस्थितियों में यीशु मानवजाति के पास आ कर मुलाकात करता है,उसे आशा देता है, विलाप करने वालों को शान्ति देता है, उन लोगों के घावों को चंगा करता है जो वर्तमान में उन दुखों को सह रहे हैं जिनका सामना समाज कर रहा है। इस सत्य को स्मरण करने से शान्ति मिलती है कि जब मानवजाति पाप में डूब रही थी और बचने का कोई रास्ता नहीं था, तब यीशु ने क्रूस पर अपने प्राण देने के द्वारा उद्धार दिया।

इस वैश्विक सन्दर्भ में हम मसीह के चेलों द्वारा उस समय की गई प्रार्थना का उल्लेख कर सकते हैं जब वे उस समय के सत्ताधारियों की धमकियों से उत्पन्न सकंट का सामना कर रहे थे। सरकार के कानूनों के कारण मसीह का प्रचार करना मसीही समुदाय के लिए जोखिमभरा था, यहाँ तक कि उनके प्राणों को भी खतरा था।

“अब हे प्रभु, उनकी धमकियों को देख; और अपने दासों को यह वरदान दे कि तेरा वचन बड़े हियाव से सुनाएँ। चंगा करने के लिए तू अपना हाथ बढ़ा कि चिन्ह और अद्भुत काम तेरे पवित्र सेवक यीशु के नाम से किए जाएँ (प्रेरित 4ः29-30)।

इसलिए, इन कठिन समयों के मध्य, वैश्विक ऐनाबैपटिस्ट समुदाय के रूप में हमारे लिए यह सम्भव है कि हम मानवजाति को यीशु मसीह की आशा प्रदान करें जबकि हम हियाव और साहस के साथ परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें इस वास्तविकता को रूप देने के लिए हियाव और ढाढ़स प्रदान करें, हम साथ ही साथ, कष्ट सह रहे और आशा खो चुके लोगों की सहायता करें व उनसे प्रेम रखें और उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करें।

—जो रुटिलियो, रिवास डोमिन्गुएज, इस्तिमिना, कोलम्बिया के एक पासवान, और एमडब्यूसी मिशन कमीशन के एक सदस्य द्वारा जारी एक एमडब्ल्यूसी विज्ञप्ति।

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